बुधवार, 19 मई 2010

हे परमपुरूषों बख्शो..., अब मुझे बख्शो... -- सुश्री अरूणा राय

क्रिएटिव मंच पर आपका स्वागत है !

इस मंच के शुरआती दौर से ही हमने हिंदी व् अन्य भाषाओँ के चर्चित लेखक / लेखिका की चुनिन्दा रचनाएँ आप के समक्ष प्रस्तुत करते रहे हैं ! इसी श्रृंखला के अंतर्गत आज प्रस्तुत हैं -'सुश्री अरुणा राय की छह बेहतरीन कवितायें'

आशा है आप का सहयोग एवं सराहना हमें पूर्ववत मिलता रहेगा और प्रस्तुत रचनाओं पर आप के विचारों की प्रतीक्षा रहेगी !
प्रस्तुति :- -प्रकाश गोविन्द


सुश्री अरूणा राय

aruna rai

परिचय

उपनाम : रोज
जन्‍म : इलाहाबाद
तिथि : 18 नवंबर 1986


प्रकाशन : छोटी उम्र से सक्रिय लेखन,
शीर्षस्थ पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन !


fantasy
कितना छोटा है जीवन
================
जीने के लिए
कितनी छोटी है दुनिया
चलने के लिए
कि आदमी पांवों से कम
हवाओं पे चलता है ज्‍यादाIMG_0015
भावों में कम
अभावों में पलता है ज्‍यादा
और बाकी रह जाते हैं सपने
बाकी रह जाता है जीना

एक एक सपने को
सच करने में लग जाते हैं
कई कई युग
पर सपने हैं कि दम नहीं तोडते कभी
अभाव के व्‍यंग्‍य से
जूते चबाता आदमी
देखता रहता है सपने
जीता रहता है सपने
और सच क्‍या है
उस स्‍वप्‍न के सिवा
जो आदमी की नींद में पलता है
जिसके लिए जगकर वह
मीलो मील चलता है
फिर थककर उसी सपने का हो रहता है !
***********************************************************
कुछ तो है हमारे बीच
===============
कुछ तो है हमारे बीच
कि हमारी निगाहें मिलती हैं
और दिशाओं में आग लग जाती है

कुछ तो है
कि हमारे संवादों पर
निगाह रखते हैं रंगे लोग
और समवेत स्‍वर में
करने लगते हैं विरोध

कुछ तो है कि रूखों पर पोती गयी कालिख
जलकर राख हो जाती है banner-artemis-detail2-DS-BA-024_t

कुछ तो है हमारे मध्‍य
कि हर बार निकल आते हैं हम
निर्दोष, अवध्‍य

कुछ तो है
जिसे गगन में घटता-बढता चांद
फैलाता-समेटता है
जिसे तारे गुनगुनाते हैं मद्धिम लय में
कुछ तो है कि जिसकी आहट पा
झरने लगते हैं हरसिंगार
कुछ है कि मासूमियत को
हमपे आता है प्‍यार...
***********************************************************
अदृश्य परदे के पीछे से
================
अदृश्य परदे के पीछे से
दर्ज़ कराती जाती हूँ मै
अपनी शामतें
जो आती रहती हैं बारहा

अक्सर
उन शामतों की शक्लें होती हैं
अंतिरंजित मिठास से सनी
इन शक्लों की शुरूआत
अक्सर कवित्वपूर्ण होती है
और अभिभूत हो जाती हूँ मै3801_symposium_200_tn
कि अभी भी करूणा,स्नेह,वात्सल्य से
खाली नहीं हुई है दुनिया

खाली नहीं हुई है वह
सो हुलसकर गले मिलती हूँ मै
पर मिलते ही बोध होता है
कि गले पड़ना चाहती हैं वे शक्लें
कि यही रिवाज है परंपरा है

कि जिसने मेरे शौर्य और साहस को
सलाम भेजा था
वह कॉपीराइट चाहता है
अपनी सहृदयता का, न्यायप्रियता का
उस उल्लास का
जिससे मुझे हुलसाया था

और ठमक जाती हूँ मै
सोचती हुई-
क्या चेहरे की चमक
मेरे निगाहों की निर्दोषिता
काफ़ी नहीं जीने के लिए

सोच ही रही होती हूँ कि
फ़ैसला आ जाता है परमपिताओं का
और चीख़ उठती हूँ -
हे परमपुरूषों बख्शो..., अब मुझे बख्शो!
***********************************************************
अभी तूने वह कविता कहाँ लिखी है, जानेमन
============================
अभी तूने वह कविता कहाँ लिखी है, जानेमन
मैंने कहाँ पढ़ी है वह कविता
अभी तो तूने मेरी आँखें लिखीं हैं, होंठ लिखे हैं
कंधे लिखे हैं उठान लिए
और मेरी सुरीली आवाज लिखी है

पर मेरी रूह फ़ना करते
उस शोर की बाबत कहाँ लिखा कुछ तूने
जो मेरे सरकारी जिरह-बख़्तर के बावजूद
मुझे अंधेरे बंद कमरे में
एक झूठी तस्सलीबख़्श नींद में ग़र्क रखता है Giacomo_Balla-Mercury_Passing_Before_the_Sun-Tempera_on_Canvas_Board-1914

अभी तो बस सुरमयी आँखें लिखीं हैं तूने
उनमें थक्कों में जमते दिन-ब-दिन
जिबह किए जाते मेरे ख़ाबों का रक्त
कहाँ लिखा है तूने

अभी तो बस तारीफ़ की है
मेरे तुकों की लय पर प्रकट किया है विस्मय
पर वह क्षय कहाँ लिखा है
जो मेरी निग़ाहों से उठती स्वर-लहरियों को
बारहा जज़्ब किए जा रहा है

अभी तो बस कमनीयता लिखी है तूने मेरी
नाज़ुकी लिखी है लबों की
वह बाँकपन कहाँ लिखा है तूने
जिसने हज़ारों को पीछे छोड़ा है
और फिर भी जिसके नाख़ून और सींग
नहीं उगे हैं

अभी तो बस
रंगीन परदों, तकिए के गिलाफ़ और क्रोशिए की
कढ़ाई का ज़िक्र किया है तूने
मेरे जीवन की लड़ाई और चढ़ाई का ज़िक्र
तो बाक़ी है अभी...

अभी तुझे वह कविता लिखनी है, जानेमन...
***********************************************************
आखिर हम आदमी थे
==============
इक्कीसवीं सदी के
आरंभ में भी
प्यार था
वैसा ही आदिम
शबरी के जमाने सा
तन्मयता वैसी ही थी
मद्धिम था स्पर्श
गुनगुना...
आखिर हम आदमी थे
इक्कीसवीं सदी में भी..
कि अपना ख़ुदा होना
=============
ग़ुलामों की
ज़ुबान नही होती
सपने नही होते
इश्क तो दूर
जीने की
बात नही होती
मैं कैसे भूल जाऊँ
अपनी ग़ुलामी
कि अपना ख़ुदा होना
कभी भूलता नहीं तू...
***********************************************************
The End
***********************************************************

36 टिप्‍पणियां:

  1. ीअरुणा जी बिलकुल सही कहा अपना खुदा होना कोई नही भूलता अगर ये भूल जाये तो आदमी कभी जानवर की तरह व्यवहार ना करे। उसका अहं ही सब विपताओं की जड है। सभी रचनायें अच्छी लगी। अनंत जी आपको भी बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक से बढ़कर एक रचनाये ,

    उत्तर देंहटाएं
  3. अरुणा जी की सभी कवितायेँ अच्छी लगीं.अलग अलग रंगों में रंगी है.

    'निगाह रखते हैं रंगे लोग'
    --कुछ है कि मासूमियत को
    हमपे आता है प्‍यार...
    ----------
    'वह कॉपीराइट चाहता है
    अपनी सहृदयता का, न्यायप्रियता का
    उस उल्लास का
    जिससे मुझे हुलसाया था '

    बहुत खूबसूरत भावाभिव्यक्ति मिली इनकी कविताओं में.
    'अदृश्य परदे के पीछे से' कविता में भावों की कसमसाहट नज़र आती है तो 'अभी तूने वह कविता'...गहन भाव समेटे हुए है.
    यह इनकी इन सब कविताओं में सब से उत्कृष्ट रचना लगी.ऐसा लगता है जैसे जिंदगी इंसान से कह रही हो..अभी तो आसान राहें ही देखी हैं...कठिन डगर अभी चलना बाकि है!

    -'कितना छोटा है जीवन'
    और 'कि अपना ख़ुदा होना' भी बहुत पसंद आयीं.
    -कविता का साथ लगाये गए चित्रों का चयन सुरुचिपूर्ण है और कविता के भावों के अनुकूल लगे.
    -एक और उत्तम प्रस्तुति.आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  4. sabhi kavitaye tumhare komal man ki sashakt abhivyakti detee hai. badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  5. aapki prastuti hamesha hi bahut prabhavshali hoti hai. abhi do kavitayen padhi hain. dono hi sach men behtareen hain.
    aapka aabhaar
    baad men aakar baaki ki kavitayen bhi padhti hun

    उत्तर देंहटाएं
  6. कुछ बात तो है कविताओं में
    गहरी अभिव्यक्ति लिए कवितायें बहुत कुछ अनायास कह जाती हैं. कई पंक्तियाँ ऐसी हैं जो पंच की तरह दिमाग पे पड़ती हैं जैसे -
    "एक एक सपने को
    सच करने में लग जाते हैं
    कई कई युग
    पर सपने हैं कि दम नहीं तोडते कभी"

    सभी रचनाएँ गहरी छाप छोडती हैं
    आपका चयन और प्रेजेंटेशन प्रशंसा के लायक है
    बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेहतरीन भावों को प्रस्तुत कर रही हैं ये रचनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  8. mujhe sabhi kavitayen bahut achhi lagin. vishesh kar 'कुछ तो है हमारे बीच'
    'कितना छोटा है जीवन' and 'आखिर हम आदमी थे' jitni sundar Aruna ji khud hain, utni hi sundar unki kavitaayen hain.
    aapka dhanyvad

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर रचना है, अरुणा जी की.

    अभी पढना बाकी है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. अरुणा जी से मैं पहले से ही परिचित हूँ| मेरी इनसे मुलाक़ात ऑरकुट सोशल नेटवर्किंग साईट पर हुई थी| आज इन्हें और इनकी रचना क्रिएटिव मंच पर देखकर हार्दिक ख़ुशी हुई| अरुणा जी को शुभकामनाएं और मंच को आभार!!


    "रामकृष्ण"

    उत्तर देंहटाएं
  11. "आदमी पांवों से कम
    हवाओं पे चलता है ज्‍यादा
    भावों में कम
    अभावों में पलता है ज्‍यादा"
    कविता में कितनी खुबसूरत बात कही गयी है.
    सभी रचनाएँ अत्यंत पठनीय हैं. अल्पना जी की प्रतिक्रिया बहुत सटीक है.
    आप लोग बहुत मेहनत से रचनात्मक कार्य कर रहे हैं. अतः बधाई के पात्र आप लोग भी हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  12. abhi sirf ek hi kavita sahi se padh paya hun -'अभी तूने वह कविता कहाँ लिखी है, जानेमन'
    bahut hi lajawaab kavita hai. yah kavita aisi hai jo mujhe yaad rahegi hamesha. baaki kavitayen baad men padhunga. badhiya prastuti

    उत्तर देंहटाएं
  13. bahut hi umda prastuti...sabhi kavitaye gahan bhav liye huye...aruna ji ko bahut shubhkamnaye...

    उत्तर देंहटाएं
  14. Aruna ji ki sabhi kavitaye sundar aur padhne ke layak hain.
    pahli kavita-कितना छोटा है जीवन aur aakhir ki dono kavitaye आखिर हम आदमी थे and कि अपना ख़ुदा होना bahut achhi lagi.
    aapne itni achi kavitaye padhvayi aapko thanks

    उत्तर देंहटाएं
  15. aruna ji aapki rachnaayen ..aap hi ki tarah bahut sundar hai :)

    उत्तर देंहटाएं
  16. kis-kis kavita kee tareef karun ?
    Aruna ji ne apni kavitaon men aise bhaav utaare hain jo seedhe dil tak pahunchte hain. sabhi kavita dil ko chhune men kamyab hain.
    bahut badhayi aur shubhkamnayen

    उत्तर देंहटाएं
  17. बहुत अर्थपूर्ण
    अरुणा राय जी की कवितायेँ बहुत पसंद आयीं.
    आपकी अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  18. सभी कवितायें कई बार पढ़ीं. अरुणा जी की कवितायेँ भावपूर्ण तो हैं ही साथ ही बहुत अर्थपूर्ण भी हैं. 'कितना छोटा है जीवन' कविता जीवन से रूबरू कराती है - "आदमी पांवों से कम
    हवाओं पे चलता है ज्‍यादा / भावों में कम
    अभावों में पलता है ज्‍यादा / और बाकी रह जाते हैं सपने"
    सच में यही तो है जीवन
    कविता-'अदृश्य परदे के पीछे से' की इस पंक्ति पर ठहर जाती हूँ-
    "क्या चेहरे की चमक / मेरे निगाहों की निर्दोषिता
    काफ़ी नहीं जीने के लिए"
    कितना कुछ कह जाती हैं ये पंक्तियाँ
    सभी कवितायेँ पढ़कर अभिभूत हूँ
    इतनी सुन्दर कविताओं को सामने लाने के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद
    और अरुणा जी को शुभ कामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  19. अलग अलग रंगों में रंगी अरुणा जी की सभी कवितायेँ अच्छी लगीं.
    सभी रचनाएँ गहरी छाप छोडती हैं
    आपका चयन और प्रेजेंटेशन प्रशंसा के लायक है
    बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  20. सुश्री अरुणा जी आपकी सभी रचनाएँ गहरे भावों को अपने में समेटे हुए हैं.
    आपको बहुत बधाई.
    अनंत जी आपका प्रयास सराहनीय है आपने छुपे प्रतिभाओं को एक मंच पर लाया है और हमसे परिचय करवाया.
    सहृदय आभार.
    :)
    रोशनी

    उत्तर देंहटाएं
  21. sabhi kavitayen dil ko touch karti hain. bahut pasand aayin.
    aruna ji ko badhayi aur shubh kamnayen

    aapka aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  22. सारी रचनाएँ बहुत अच्छी लगी! एक से बढ़कर एक रचनाएँ हैं! उम्दा प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  23. सभी कवितायेँ अच्छी लगीं....
    बधाई....

    उत्तर देंहटाएं
  24. अच्छा लगा इस ब्लॉग पर आ कर
    आगे से मे भी भाग लूँगा इस प्रतियोगीता मे
    http://sciencemodelsinhindi.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  25. bahut achhi lekhika hain aap..
    bahut achha likhti hain...

    Meri Nai Kavita padne ke liye jaroor aaye..
    aapke comments ke intzaar mein...

    A Silent Silence : Khaamosh si ik Pyaas

    उत्तर देंहटाएं
  26. क्रिएटिव मंच के सभी सदस्यों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई!!
    नयी पोस्ट का इन्तजार है.

    उत्तर देंहटाएं
  27. सारी रचनाएँ बहुत अच्छी लगी! एक से बढ़कर एक रचनाएँ हैं! उम्दा प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  28. sabhi kavitaein ek se badhkar ek hain. sach kahun to kin shabdon ka istemaal karun apki rachnaon ki tareef me samajh nai aa raha.

    --Mayank

    उत्तर देंहटाएं

'आप की आमद हमारी खुशनसीबी
आप की टिप्पणी हमारा हौसला'

संवाद से दीवारें हटती हैं, ये ख़ामोशी तोडिये !

CTRL+g दबाकर अंग्रेजी या हिंदी के मध्य चुनाव किया जा सकता है
+Get This Tool