मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

फ़िल्म- शाहिद (2013) : सच्ची बात कही थी मैने, सूली चढ़ा दिया

 [बेहतरीन फिल्मों की उत्कृष्ट समीक्षा - 5]
Film - SHAHID (2013)   
समीक्षक - रोहित यादव जी
 कुछ तो मुझसे सीखों यारों, 
सच्ची बात कही थी मैने, लोगों ने सूली पर चढ़ा दिया

सत्यमेव जयते” बात आमिर खान के टी.वी. शो की नहीं, बल्कि बात उस राष्ट्रीय सिध्दांत की जिसे हम दीवालों पर, भारत सरकार के हर राजपत्र पर और हमारे बटुये में रखे हुये नोट के एक कोने में लिखा हुआ पाते है। आज़ाद भारत के हुक्मरानों ने बहुत सोच समझ कर जब इस संस्कृत की इस सूक्ति को मुंडक उपनिषद से निकाल कर भारत का राष्ट्रीय सिध्दांत बनाने का विचार बनाया होगा, तब उन्होनें ये बिल्कुल नही सोचा होगा कि उनकी आने वाली पीढ़ियाँ आगे चलकर एक ऐसे देशकाल में जीने के लिये अभिशप्त होंगी जहाँ “सत्य” की तो विजय होगी पर सबसे पहले उस अधनंगे फकीर की हत्या की जायेगी, जिसने पूरी ज़िंदगी सत्य और अहिंसा की साधना की। इसी देश में “सत्य” की मशाल थामने वाले हाथों को काटा जायेगा। “सत्य” और न्याय की लड़ाई करने वालों के साथ बलात्कार किये जायेंगे। वैज्ञानिक जागरूकता पैदा करने वालों दाभोलकरों की हत्या की जायेगी, और गरीब मुस्लिम जनता के लिये न्याय की माँग करने वाले “शाहिद आज़मी” को पहले फोन पर धमकाते हुये जेहादियों का गाँधी कहा जायेगा और फिर उन्हें भी तीन गोलियों से छलनी कर दिया जायेगा।

म सभी को बतलाया जाता है कि आतंकवादी वो मुस्लिम युवा होते है जिनका तथाकथित “ब्रेनवाश” किया जाता है। पर क्या हमारा ब्रेनवाश नही किया जाता कि जब चीख चीख कर मीडिया कह रहा होता है कि फलाना विस्फोट के मामले में इतने मुस्लिम युवा गिरफ्तार। ... पर मीडिया ये बताना भूल जाता है कि उन मुस्लिमों की आर्थिक पृष्ठभूमि क्या है ... और यही सवाल फिल्म अपने कोर्ट रूम में जज़ से पूछती है कि क्यों पुलिस की जाँच में अधिकतर अभियुक्त वो होते है जो गरीब होते है ... और यकायक उनके खिलाफ पुलिस सबूतों और गवाहों की एक झड़ी लगा देती है .... फिर जज़ साहब अपना फैसला सुना देते है ... फिर मीडिया चिल्ला चिल्ला कर आप के ड्रांईग रूम तक ये बात पहुँचा देता है कि ज़नाब सज़ा हो गई है ... और देश में कानून व्यवस्था का राज़ चल रहा है ... पर इस बीच में वो नीचे न्यूज़ रील में एक छोटी सी लाईन चला देता है कि टाडा के तहत सज़ा पाये हुये संजय दत्त नामक एक शख्स की पैरोल की अवधी को 14 दिनों के लिये और बढ़ा दिया गया है ... और गृह-मंत्रालय और महाराष्ट्र सरकार इसे और बढ़ाने के लिये वार्ता कर रहा है। हम तक इन दो खबरों के बीच की आर्थिक गहराई नही आती और हम उस वक़्त फेसबुक पर स्टेटस अपडेट कर रहे होते है “हुर्रे हम जीत गये, टेररिज्म डाऊन डाऊन”। इस पूरे प्रकरण में बरबस “अंधेर नगरी” नाटक याद आता है कि अगर कुछ हुआ है तो किसी को तो सज़ा मिलनी ही चाहिये। भले ही वो असली गुनाहगार हो या ना हो।

“शाहिद” अपने शुरूवाती दो मिनटों में पहले शाहिद आज़मी की ज़िंदगी का फ़लसफ़ा बताती है और फिर दो गोलियों की आवाजें, जो आपकेकान के पर्दे को भेदती हुई आपके दिल के उस कोने तक जाती है। जहाँ एक सहमा हुआ सा एहसास रहता है कि अगर आप सच्चे है और ईमानदार है तो आप इस देश में सुरक्षित है?? फिल्म शुरू होती है 1993 के दंगों से जब जिजिविषा इतनी स्वार्थी हो जाती है कि दंगे मे बाहर फंसे हुये अपने बेटे के लिये भी माँ दरवाजा नही खोल रही होती। फिर वही लड़का अपने भटके हुये मन से आतंकवादी शिविर में प्रशिक्षण के लिये जा पहुँचता है, जहाँ जा कर उसे समझ आता है कि गलत मोड़ पर ज़िंदगी आ चुकी है। वह वहाँ से भी भागता है गोया अपने जीवन के लिये भाग रहा होता है। पर इस सफर का अंत यहाँ नही होता जिस सिस्टम से वो जेहाद करना चाहता था वही सिस्टम उसे पाँच साल के लिये तिहाड़ में भेज देता है। बस फिल्म का ये जो तिहाड़ जेल वाला दौर होता है वही आपको मज़बूर करता ये विश्वास करने के लिये कि आपके देश में संविधान के कुछ “शब्द” किताबों के इतर भी अपना एक वजूद रखते है।

जेल के बाहर आते ही शाहिद समझ जाते है कि अन्याय दिखा कर ख़ुदा ने उसे न्याय का महत्व दिखा दिया। यही से एक दूसरा संघर्ष शुरु होता है, जिसमें शाहिद अपने मकसद के लिये अपना सब कुछ दाँव पर लगा देते है। इतनी मुसीबतों के बीच भी शाहिद भी एक आम इंसान ही थे। ये आपको तब समझ आता है जब वो एक तलाक़शुदा महिला से प्यार करते हुये अपना आम जीवन बिताना चाहते थे। यही तलाक़शुदा महिला जो शुरु में कहती है कि आप सही काम के लिये डरिये मत वही महिला शादी के बाद इसी बात के लिये शाहिद को डाँटती है और कहती है कि "पहले जब पहले कहा था तब मैं तुम्हारी पत्नी नही थी"। यह इतनी मार्मिक चोट है जिससे शायद हर “शाहिद” गुज़रता होगा जो ये भी बताता है कि हमारे सिध्दांत, हमारे आदर्श और हमारी प्रगतिशीलता सब कि सब एक फोल्डिंग पलंग की तरह हो चुके है। जिसे हम जब चाहे तब बिछा कर अपने गुणों का थोथा बखान करते है और जब चाहे तब उन्हें समेट कर दिवाल के के कोने से लगा कर रख देते है कि “भाईसाहब बी प्रैक्टिकल”।.

स अति भावुक हिस्से में भी कैमरा पति-पत्नि की लड़ाई के बीच से थोड़ा हटकर उस बच्चे पर भी चला जाता है, जिसे पिछले छ: दिनों से बुख़ार है। जिसकी बेचैन निगाहें कुछ समझ ही नही पा रही है कि क्यों उसके पिता को इस बात की ख़बर तक नही हो पायी है। अब उस मासूम को कौन समझाये कि उसके पिता समाज के कैंसर से लड़ रहे है और उसकी कीमत कहीं ना कहीं उसका अबोध बचपन चुका रहा होता है।

कुछ और भी ऐसे दृश्य है जो ये बताते है कि सत्य और न्याय की लड़ाई के पीछे कौन-कौन खड़े होते है ... क्या वो तिहाड़ जेल का वार्डन, जिसने शाहिद को पढ़ने की अनुमति दी ... क्या वो कश्मीर का व्यापारी जिसने शाहिद को “उधार” पैसे दिये, ... क्या वो प्रोफेसर जिसने शाहिद की ऐतिहासिक, सामाजिक और व्यवहारिक सोच को मजबूत किया, ... क्या वो भाई जिस पर “दो पर्सनल लोन” पहले से ही है पर फिर भी वो अपने छोटे भाई के लिये एक और लोन लेने के लिये तैयार है, ... और अंत में वो पत्नी जो रात का खाना बना कर अपने पति का इंतजार कर रही होती है और पति जब आता है तो उससे बिना पूछे खाना शुरु कर देता है। क्या ये सब भी शाहिद की लड़ाई के साथी नही थे। जब आप शाहिद को एकाकी में अपनी पत्नी से अपनी बेबसी का बयान करते हुये, फोन पर ही ज़ार-ज़ार रोते हुये देखते है तो क्या आपकी आँखें नम नही होती ?? दिमाग को कुछ झंझोड़ता नही कि क्या गलती थी इस इंसान की ?? 

ही न कि वो सिर्फ न्याय चाहता था, यही ना कि वो सिर्फ ये चाहता था कि अंध-देशभक्ति की नींव में किसी बेकुसूर “फ़हीम अंसारी” की ज़िंदगी का पत्थर ना गाड़ा जाये। और यही न कि कोई निर्दोष मुस्लिम अभियुक्त अपने नवजात बेटे को अपनी गोद में उठा कर उससे कह सके कि बेटा मैं निर्दोष था मुझे फंसाया गया था। ऐसी गलती करने वाले “शाहिदों” की विश्व में दूसरी सबसे तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था में कोई जगह नही है, उन्हें मरना ही होगा।

फिल्म के सभी कलाकारों का चयन मुकेश छाबड़ा ने किसी गोताखोर की तरह किया है। समुद्र में गहरे उतर कर चुन-चुन कर वो मोती खोज़े है जो फिल्म की माला में सौ फीसदी टंच (बकौल दिग्विजय सौ प्रतिशत खरा सोना) लगते है। चाहे राजकुमार यादव हो, ज़ीशान अय्यूब हो, प्रभालीन संधू हो, शालिनी वत्स हो, तिग्मांशू धूलिया हो या खुद हंसल मेहता। हर पात्र के लिये एक दम सही चुनाव है। हर कलाकार ने कोई कसर नही छोड़ी इस सिनेमाई महाकाव्य को भव्य बनाने के लिये। अब कितने दृश्यों के बारे में लिखूं सभी तो एक से बढ़ कर एक है।      

फिल्म के लेखक समीर गौतम सिंह, हंसल मेहता और अपूर्व असरानी पूरी कहानी में किसी भी बड़ी बात के लिये इतने सधे और चुने हुये शब्दों का चयन करते है कि आप अचरज में पढ़ जाते है। एक ऐसी फिल्म जिसमें अधिकतर चरित्र मुस्लिम है पर उर्दू के लफ़्ज़ किसी की भी ज़बान पर चढ़े हुये नही होते। सभी आम चरित्रों की तरह बातें करते है।

छायाकार अनुज धवन ने डी.एस.एल.आर. छायांकन का महत्व समझा दिया है। फिल्म के क्रेडिट के अंत में “canon EOS” लिख कर आना एक नई सिनेमा क्रांति की ज़ोरदार दस्तक है। जो ये कह रही है कि अगर आप के पास कोई बढ़िया कहानी है, और आप उस पर फिल्म बनाना चाहते है तो बस स्क्रिप्ट लिखिये, अपना डी.एस.एल.आर. कैमरा उठाईये और एक फिल्म बना डालिये। बाकी आगे का काम तकनीक साध लेगी।

संपादक अपूर्व असरानी जिन्होंने 1998 में ही “सत्या” का संपादन कर पहली ही फिल्म में बेस्ट एडिटर का फिल्म फेयर अवार्ड जीता था। उनका कहानी कहने का तरीका आज भी उनकी पहली फिल्म की ही तरह ताज़ा-तरीन है। लंबे समय बाद आपका काम बड़े पर्दे पर देखा बहुत अच्छा लगा और आपको निर्देशक की कुर्सी से ज्यादा वक़्त संपादन की डेस्क पर बिताना चाहिये। हम सभी को बहुत अच्छा लगेगा और शायद कहीं ना कहीं आपको भी।

फिल्म के निर्देशक हंसल मेहता जी के बारे में जितना कहा जाये उतना ही कम है बकौल अपूर्व शुक्ल आपने शायद “खाना खज़ाना” का निर्देशन करते वक़्त ही ये समझ लिया था कि सिनेमाई मसालों का सही मिश्रण कैसे तैयार किया जाता है। आपको सिर्फ और सिर्फ सलाम। बहुत बहुत बधाई। आशा है कि आपकी अगली फिल्म भी हम सब को फिल्म देखने के बाद सिनेमा हॉल की कुर्सी पर बैठ कर अपनी नम आँखों को पोंछने के लिये रूमाल निकालने के लिये मज़बूर कर देगी और उससे भी ज्यादा चोट करेगी हमारी जड़ता पर।
         
फिल्म के बारे में कहीं पढ़ा था कि ये फिल्म एक करोड़ से भी कम बजट में बनाई गई है। बोहरा ब्रदर्स, अनुराग कश्यप और डिज्नी यूटीवी को बहुत बहुत धन्यवाद कि उन्होनें ऐसी फिल्म को बड़े पैमाने पर वितरित किया। बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में इस बात का रोना रोने वालों को अब चुप हो जाना चाहिये कि भारत में अच्छी फिल्में कोई नहीं देखता। हमें फक्र होना चाहिये कि अब हिन्दी सिनेमा के कुछ फिल्मकार सिनेमाई किशोरावस्था से विकसित हो कर वयस्कता की ओर कदम बढ़ा रहे है। हम उस तथाकथित बाज़ारवाद में है जहाँ ऐसी संवेदनशील फिल्मों का बनना और रिलीज होना आम बात हो चुकी है। (ये बात प्रकाश झा जी के लिये नही है)  
        
तो जाईये ये फिल्म देखिये ताकि “शाहिद” की पूरी टीम को हौंसला मिले                       
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The End
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समीक्षक : रोहित यादव जी 
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3 टिप्‍पणियां:

  1. jid din film release huyi uske agle din hi film shahid dekhi. jabardast film hai aur dil ko jhakjhorti hai. film ke kayi scenes bahut prabhavshali hain.
    Rohit ji ne film ke har pahlu par baat karte huye perfect samiksha likhi hai.
    bahut badhayi

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  2. film to nahi dekhi abhi tak. lekin details padhkar ehsas ho raha hai ki umda film hogi.
    aapka shukriya

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  3. फिल्म देखी नहीं मगर आप की समीक्षा पढ़कर लगता है कि अब जल्द ही देखनी पड़ेगी.
    मानवीय संवेदनाओं को खूबसूरती से फ़िल्मी परदे पर चित्रित करना और एक सामाजिक सन्देश को दर्शकों तक उनके विचारों को झकझोरते हुए पहुँचाने का सफल प्रयास करने वाली फिल्मे बहुत ही कम बनती हैं.यह फिल्म ऐसी ही फिल्मों में से एक प्रतीत होती है.आभार इस समीक्षा तक पहुंचाने का ...फिल्म देखने के बाद फिर आऊँगी फिल्म के बारे में अपने विचार देने ..

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