रविवार, 4 जनवरी 2015

फ़िल्म - इजाज़त (1987) : कोहरे में जमीं और आसमां के बीच भीगती जिन्दंगी


[बेहतरीन फिल्मों की उत्कृष्ट समीक्षा - 8]
Film - Izaazat (1987) 
समीक्षक - राकेश जी
फ़िल्म - इजाज़त (1987)
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इजाज़त मूलतः एक प्रेम कहानी है जो ताजगी भरे अहसास को दर्शकों तक लाती है। सुखद बात यह है इस फिल्म के साथ कि तमाम अन्य हिन्दी फिल्मों की तरह यह घिसी पिटी और फार्मूलों पर आधारित प्रेम कहानी नहीं है। 

यहाँ प्रेमियों के अलगाव के पीछे किसी खलनायक का कोई षडयंत्र नहीं है। यहाँ किरदार खुद जिम्मेदार हैं अपने द्वारा उठाये गये अच्छे और बुरे कदमों के लिये। कोई उन्हे बरगलाता नहीं है, कोई गलतफहमी भी उत्पन्न नहीं करता। इजाज़त जिंदगी को अपनी समझ से जीते चरित्रों की कहानी है। 

इजाज़त बेहद सभ्य किरदारों की प्रेम कहानी है। ज़िन्दगियाँ यहाँ दुख तो पाती हैं पर दोषी कोई नहीं है। बेहद अच्छे लोग भी गलतियाँ कर जाते हैं। बेहद सुलझे हुये लोग भी वह देख लेते हैं जो शायद सच तो है पर उस सच की व्याख्या वह नहीं है जो उन्होने कर ली है और जिसके वशीभूत होकर वे कुछ ऐसा निर्णय ले लेते हैं जो उनके और उनके प्रिय के जीवन में दुख लेकर आता है।

स्त्री-पुरुष के मध्य रिश्ते पर बनी यह फिल्म गुलज़ार की ऐसे ही सम्बंधो पर बनी अन्य फिल्मों से ज्यादा गुणवत्ता वाली है। यह फिल्म 1987 में रिलीज हुयी थी जबकि हिन्दी सिने उद्योग से हर हफ्ते ऊटपटाँग फिल्में आने का दौर जोर पकड़ चुका था। बहुमत बेहद ऊलजलूल किस्म की फिल्में रिलीज होने का था और ऐसे कुरुपता फैलाते वातावरण में इजाज़त सौन्दर्य का अवतार बन कर आयी थी और तब से यह हिन्दी सिनेमा में कवित्त भाव लिये हुयी कुछ सिरमौर फिल्मों की जमात में ससम्मान शामिल हो चुकी है और सालों से दर्शकों को लुभाती आ रही है।

कथा और एक तार्किक कथा से ज्यादा इजाज़त का महत्व है फिल्मांकन में। दृष्य दर्शक को मनाते हैं, प्रभावित करते हैं। सुधा (रेखा) और महेन्द्र (नसीरुद्दीन शाह) आपस में शादी करते हैं माया (अनुराधा पटेल) और महेन्द्र के बारे में सब कुछ जानकर भी। वे शादी क्यों करते हैं, इस बात पर फिल्म नहीं टिकी है बल्कि यह एक स्थिति है जिसकी संभावना धरती पर मौजूद मानवों के जीवन में हो सकती है और होती भी है और इस फिल्म की कहानी में तो खैर है ही। परिस्थितियों के वशीभूत होकर सुधा और महेन्द्र की शादी हो गयी है और यह एक कदम फिल्म की इमारत बनाने के लिये एक स्तम्भ का कार्य करता है। सो “क्यों” से ज्यादा फिल्म का जोर इस बात पर है कि “जब ऐसा हो जाये तो क्या संभावनायें हैं ऐसे रिश्तों वाली फिल्म में“! 

एक तरह से देखा जाये तो इजाज़त वहाँ से सिरे उठाती हुयी शुरु होती है जहाँ विजय आनंद और जया भादुड़ी अभिनीत फिल्म – कोरा काग़ज खत्म हुयी थी। 

फिल्मांकन के स्तर पर फिल्म बेहद योजनाबद्ध है। चरित्रचित्रण ही ले लीजिये। महेन्द्र द्वारा शुरु में ही रेलवे वेटिंग रुम में दिखायी गयी अस्त-व्यस्तता उसकी आदतों को दर्शकों को दिखाती है और ऐसा सूचित करती है कि कहीं न कहीं यह आदमी बेहद बेतरतीब है और इसे महिला पर निर्भर होना चाहिये अपनी ज़िन्दगी को संवारने के लिये और सुव्यवस्थित बनाने के लिये।

सुधा महेन्द्र को वेटिंग रुम में देखकर एक पत्रिका से अपना
मुँह छिपा लेती है जिससे कि महेन्द्र उसे न देख पाये। गुलज़ार एक रहस्यमयी अंदाज में फिल्म शुरु करते हैं और सस्पैंस का यह तत्व फिल्म के क्लाइमेक्स तक मौजूद रहता है। महेन्द्र को वेटिंग रुम में देखने के बाद सुधा द्वारा किये गये व्यवहार से दर्शक समझ जाता है कि सुधा और महेन्द्र का कोई साझा भूतकाल अवश्य रहा है और यह बात दर्शक में एक उत्सुकता को जन्म देती है। वह इन दोनों के मध्य भूतकाल में बीते हुये इस सांझे समय की विरासत को जानने, पहचानने और खोजने के लिये बैचेन हो जाता है। 

इजाज़त चरित्र और रिश्ते प्रधान फिल्म होते हुये भी संवाद द्वारा बताने से ज्यादा दृष्यों की सहायता से दिखाने पर जोर देती है। सुधा को वहाँ वेटिंग रुम में बैठा देख महेन्द्र अपना सूटकेस खुला ही छोड़ कर बाथरुम चला जाता है। शायद यह सोचकर कि वह तो देख ही लेगी। 

वहीं वेटिंग रुम में चाय पीते हुये सुधा और महेन्द्र के बीच होने वाले संवाद पर जरा गौर करें कि कैसे धीरे धीरे उनके बीच किसी किस्म के पूर्व-सम्बंध होने की परतें निर्देशक ने खोली हैं सुधा के यह पूछने पर कि क्या वह अभी तक उसी पुराने घर में ही रहते हैं, महेन्द्र कहते हैं - "सब कुछ वही तो नहीं है पर है वहीं“। 

हिन्दी सिनेमा में चेतन आनंद की हीर-रांझा ही ऐसी फिल्म रही है जहाँ पर कि संवाद भी काव्य के रुप में रचे और बोले गये गये थे। इजाज़त भी गद्य और पद्य का बहुत खूबसूरत मिश्रण लेकर दर्शकों को रस में सराबोर करती हुयी चलती है। माया (अनुराधा पटेल) हृदय से कवि है। उसके क्रिया-कलाप अनपेक्षित हैं। उसके चरित्र के द्वारा गुलज़ार ने अपनी काव्य प्रतिभा का भरपूर दोहन किया है। माया के आने से पहले ही उसका साया फिल्म में प्रवेश पा जाता है। 

माया महेन्द्र के रिश्ते की प्रकृति तुरंत स्पष्ट हो जाती है जैसे ही महेन्द्र अपने दादा (शम्मी कपूर) से मिलकर वापिस शहर में अपने घर पहुँचता है और वहाँ उसे माया की एक प्रेममयी धमकी देखने को मिलती है - “बिना बताये चले जाते हो, जाके बताऊँ कैसा लगता है“?

प्रेमी के लिये उस भाव को अपने प्रेमी तक पहुँचाना जरुरी लगने लगता है जिससे उसका सामना हो रहा है। माया, महेन्द्र के लिये छोड़े पत्र में शब्दों से विम्ब चित्रित कर जाती है -
"चलते चलते मेरा साया कभी कभी यूँ करता है,
जमीं से उठके सामने आकर हाथ पकड़ के कहता है
अबकी बार मैं आगे आगे चलता हूँ
और तू मेरा पीछा करके देख जरा क्या होता है?"

ये वे कल्पनायें हैं जहाँ साये जमीन से उठ पड़ते हैं और अपने ही वास्तविक वजूद से बातें करने लगते हैं। ऐसी कल्पनायें एक विशिष्ट वातावरण रचती हैं फिल्म में और जिसके जादुई परिवेश में दर्शक खो जाता है। माया दिखती नहीं है अभी तक पर उसके वर्णन के द्वारा फिल्म उसकी पेंटिंग रचने लगती है। उसे रुबरु भले ही न देखा हो दर्शक ने अभी तक पर वह आकार ले चुकी है। वह कैसी होगी इसका अंदाजा लगने लगता है। अभी तक रहस्य की चादरों में ढ़की इस शख्सियत, माया, की तारीफ में उसकी सहेली मोना, महेन्द्र से कहती है कि एक बार खुद माया ने उससे कहा था - "मोना मैं सूखे पत्ते की तरह उड़ कर महेन्द्र के कॉलर पर जा अटकी।"

एक सूखे पत्ते जैसा मुक्त्त जीवन जी रही महिला को देखने के लिये दर्शक की उत्सुकता स्वाभाविक है और इजाज़त ऐसी ही उत्सुकतायें जन्माती और बढ़ाती चली जाती है। महेन्द्र की प्रेमिका (दर्शकों द्वारा अनदेखी) गायब हो गयी है और नियति महेन्द्र की शादी सुधा से करवा देती है।

पर हाथ छूट जाने से रिश्ते नहीं टूटा करते और कोई न भी हो किसी जगह पर, परंतु उसके वजूद का अहसास उस जगह पर रह ही जाता है। माया भी महेन्द्र के जीवन और घर में भौतिक रुप से अनुपस्थित होते हुये भी रहती है। माया का फोटो महेन्द्र के पर्स में देखने के बाद रेखा का सुधा के रुप में किया हुआ अभिनय गवाह बन कर देखने की चीज है। महेन्द्र जैसे स्पष्टीकरण देते हैं - "माया बहुत ज्यादा बसी हुयी थी इस घर में। सब जगहों से तो उसे निकाल दिया है अब कहीं कोने खुदरे में पड़ी रह गयी है वहाँ से भी हट जायेगी।"

सुधा को महेन्द्र और माया के प्रेम सम्बंधों के बारे में शादी करने से पहले से ही पता है, पर है तो वह एक जीती जागती स्त्री ही और मानवीय संवेदनायें एकदम से प्लास्टिक जैसी निर्मोही नहीं बनायी जा सकतीं कि उन पर किसी बात का कोई असर ही न हो और वह भी सभ्यता के दायरे में अपना पक्ष रखती है - "मैं कहाँ कह रही हूँ कि हटा दो या निकाल दो उसे… सिर्फ ये कि सब कुछ ही बंटा हुआ लग रहा है इस घर में। जिस चीज को भी छूने जाती हूँ लगता है किसी और की चीज छूने जा रही हूँ, पूरा पूरा अपना कुछ भी नहीं लगता।"

फिल्म पति पत्नी और वो जैसे रिश्तों की उलझने रचने लगती है। महेन्द्र विवाहेत्तर संबध को नहीं निभा रहे हैं। वे अपने और माया के बारे में सब कुछ पहले ही सुधा को बता चुके थे।

गुलज़ार बिना नाटकीय हुये संबधों की जाँच पड़ताल करते हैं। उनकी इजाज़त के महेन्द्र जीवन को सीधी पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। कभी कभी आदमी अपने को एक पतंग की तरह ढ़ीला छोड़ देता है कि उड़ने दो हवा के संग संग। उन्हे शायद लगा होगा कि देखा जायेगा जैसे जैसे मोड़ जीवन लायेगा वैसे जी लेंगे। शादी के बाद सुधा की तरफ से यह पहला हल्का सा विरोध माया के प्रति दर्ज हुआ है। न महेन्द्र और न ही सुधा इस स्थिति को जानबूझ कर लाये हैं। ऐसा हो गया है। महेन्द्र सुधा को दुखी भी नहीं करना चाहते। माया का फोटो पर्स में अंदर के अंधेरे कोनों की ओर खिसक जाता है।

रेलवे के वेटिंग रुम में मौका पाने पर सुधा मेज पर पड़े महेन्द्र के पर्स को ऐसे चोरी छिपे खोलती हैं अन्दर की फोटो देखने को जिससे कि महेन्द्र को इस बात का आभास न हो। महेन्द्र दरवाजे पर वेटर से बातचीत में व्यस्त हैं। सुधा की हरकत से दर्शक के मन में भी उत्सुकता जाग उठती है कि महेन्द्र के पर्स में इस वक्त किसकी तस्वीर होगी, माया की या सुधा की या दोनों की? शायद सुधा के मन में कहीं उम्मीद है कि भौतिक दूरियों के आ जाने के बाद उसका फोटो भी पर्स में हो सकता है। मन तो बेहद विचित्र चीज है ये कब क्या करने को व्यक्ति को विवश कर दे कोई नहीं कह सकता। पर फिल्म गच्चा दे जाती है दर्शक को और यह न तो सीधे-सीधे और न ही सुधा की भाव भंगिमा के द्वारा दर्शक को दिखाती है कि महेन्द्र के पर्स में किसकी तस्वीर लगी है?

सुधा जब पहली बार वेटिंग रुम में कैमरा उठाती है तो उसका जेहन पीछे बीती ज़िन्दगी में चला जाता है। साथ में दो जीवंत आदमी कितने लम्हे गुजारते हैं और कितना कुछ ऐसा जिया जाता है जो यादों के बैंक में फिक्स डिपॉजिट की भाँति एकत्रित होता जाता है!

महेन्द्र कहते हैं वेटिंग रुम में, "ऐसे में गरमा-गरम चाय मिल जाये…” और यादों के गर्भ से एक ऐसा दृष्य जन्म ले लेता है जहाँ सुधा महेन्द्र के लिये चाय लेकर आती हैं।

इजाज़त पर बिना कवित्त भाव को अपनाये हुये नहीं लिखा जा सकता। ऐसा प्रयास भी करना इस खूबसूरत फिल्म की तौहीन है। यह ऐसी फिल्म नहीं है जिसका विश्लेषण विशुद्ध रुप से गद्य में किया जा सके। वेटिंग रुम में जब सुधा महेन्द्र के गीले सिर को तौलिये से पौंछने लगती हैं तब एकाएक पार्श्व में बज उठे संगीत को सुनिये और कहीं दूर से पास और पास ही से और पास आते आनंद में खो जाइये।

ऐसी योजना के लिये बेहद सतर्कता और गजब की रचनात्मकता की जरुरत है। कोई भी लेखक रचने के अभाव वाले दिनों से जरुर गुजरता है और ऐसे दिन भी आते हैं जब रचनात्मकता चारों तरफ से बरसती है इजाज़त ऐसे ही समय की पैदाइश है जब गुलज़ार के ऊपर चारों तरफ से रचनात्मकता की बारिश हो रही होगी।

ऐसे ऐसे संवाद गुलज़ार ने रचे हैं जिन्हे सुनकर दर्शक बस फिल्म पर न्यौछावर हो जाये। महेन्द्र के लगातार बरसती बारिश के खत्म न होने को लेकर की गयी शिकायत के जवाब में सुधा धैर्य से कहती हैं - "बरस जायेगी तो अपने आप बंद हो जायेगी।"

एक अकेले आदमी की रचनात्मकता, कहानी, स्क्रीनप्ले, फिल्मांकन, दृष्य संयोजन, संवाद, गीत आदि कितने ही रुपों में उत्कृष्ट रुप में सामने आ सकती है, इजाज़त उसका ज्वलंत उदाहरण है।

वेटिंग रुम में साथ साथ बिताई जा रही एक रात सुधा और महेन्द्र, दोनों के वर्तमान के जीवन की ऐसी रात है जो उनकी बीते जीवन में किसी समय छोड़े गये सिरों को मिला देती है। सुधा के महेन्द्र की अनुपस्थिति में घर से चले जाने से सुधा और महेन्द्र के बीच एक ऐसा उधार बकाया रह जाता है जो इसलिये पनपता है क्योंकि वे इस अलगाव के कारणों पर कभी भी आमने सामने बात नहीं कर पाये। दोनों को कचोटता होगा इस संवाद का अभाव। वेटिंग रुम की यह रात वह मौका लायी है जब जो गिले शिकवे बचे थे उन्हे सुलझाया जा सकता है। बिना बताये चले जाना पीछे छूट गये लोगों को तड़पन दे जाता है।

महेन्द्र, सुधा और माया – इन नामों के अर्थ तीनों चरित्रों के गुणों और प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुधा के रुप में रेखा का चयन गजब का है। सुधा (वाया रेखा) का बाह्य और आंतरिक सौन्दर्य, उनके सलीकेदार तौर तरीके, धैर्य, और सुलझापन सब कुछ ऐसा है जो कि महेन्द्र को वैवाहिक जीवन में ठहरा सके। केवल विवाह करने के कर्तव्य से ही महेन्द्र सुधा के साथ नहीं है बल्कि वे उनसे भी उतना ही जुड़ाव महसूस करने लगते हैं जितना वे माया के साथ महसूस करते थे या करते हैं। सुधा के महेन्द्र की अनुपस्थिति में घर से चले जाने वाली रात उनके सुधा से भी प्रेम की गहराई को दिखाती है और नसीर ने क्या काबिलेतारीफ अंदाज में उन दृष्यों को अपने अभिनय से जीवंत कर दिया है!

इजाज़त में एक तरह से गद्य को पद्य में जोड़ा गुलज़ार ने और अकविता को भी बाग मे जगह दी जिससे कि वह भी पनप सके। मेरा कुछ सामान नज़्म को महेन्द्र द्वारा पढ़े जाते समय सुधा का रुदन जीवन है, जीवन की संवेदना है। यहाँ दूसरे का दर्द अपना बन गया है। यह अपने किये हुये पर पछतावे का दर्द है। यह बिना समझे कुछ कर जाने के पछतावे का दर्द है। यह एक दर्द के कविता में रुप में सामने आ जाने का दर्द है।

गुलज़ार ऐसी कल्पना का समावेश भी कर देते हैं अपने काव्य में कि अगर सुनने वाला शब्दों को सुन ले तो ठिठक जाये - "एक सौ सोलह चाँद की रातें एक तुम्हारे काँधे का तिल" – सुनने वाला बिना इस गुत्थी को सुलझाये चैन नहीं पा सकता कि क्यों गुलज़ार ने ये पंक्ति लिखी। एक सौ सोलह चाँद की रातें एक ऐसे ही वर्णित की हुयी संख्या है। महेन्द्र के कँधे पर तिल का वर्णन कविता में सुनकर सुधा को माया की महेन्द्र से नजदीकी का परोक्ष रुप से अहसास होता है और वह रोते हुये उस तिल को छूती है।

माया रहस्मयी है। जीवंत है, बिना रोक-टोक बहने वाली नदी है। माया बेफिक्र है या उसने अपनी फिक्रों को भुलाने के लिये ही जीवन जीने का ऐसा अंदाज अपना लिया है। वह भाग तो रही है, जैसी ज़िन्दगी उसे परिवार की तरफ से मिली है उससे, परन्तु जो वह कुछ करती है उससे जीवन भी उत्पन्न होता है। उसकी ज़िन्दगी बिंदास है, मौत का खौफ वहाँ नहीं है क्योंकि ज़िन्दगी की भी बहुत कीमत उसके लिये नहीं है, मौत आज आती हो तो अभी आ जाये। अपने रचे में भी उसे बहुत सहारा नहीं मिलता वरना वह अकेले रहने के ख्याल से उदास न हो जाती, नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या करने की कोशिश न करती।

एक अच्छा संवाद माया के द्वारा बोला गया है आत्महत्या करने के प्रयास पर। वह महेन्द्र से कहती है - "जानते हो महेन्द्र अगर जरुरत से ज्यादा गोलियाँ भी खा लो तो भी मौत नहीं आती क्योंकि उल्टी हो जाती है, गोलियाँ तो बस इतनी खानी चाहियें जितनी पेट पचा सके।"

साथ छूट जाने पर भी रिश्ते विचारों के स्तर पर तो बने ही रहते हैं और पुनर्मिलन होने पर याद आ गये अधिकार भी वापिस आ जाते हैं। हालाँकि साल बीत जाते हैं, कुछ आदतें दम तोड़ जाती हैं कुछ नयी आदतें जन्म ले लेती हैं। पर रिश्तों में मौजूद रहे अधिकार नहीं बदलते। वे थोड़ी सी हिचकिचाहट के बाद वापस आ जाते हैं :
आदतें भी अजीब होती हैं / सांस लेना भी कैसी आदत है
जिये जाना भी क्या रवायत है / आदतें भी अजीब होती हैं

इजाज़त में एक सच्चाई है। कविता है पर जीवन की सच्चाई से ओतप्रोत। महेन्द्र कहते हैं सुधा से - "मैं माया से प्यार करता था ये सच है और उसे भूलने की कोशिश कर रहा हूँ ये भी सही है"

वेटिंग रुम से निकलते हुये सुधा के घुटने में लगी चोट के बाद के दृष्य औरकतरा कतरा गीत का दृष्यांकन दर्शा देते हैं कि ज़िन्दगी परिभाषाओं में बँधी चिड़िया का नाम नहीं है। यह तो कल्पना से भी परे की स्वतंत्रता का नाम है बल्कि भाषा में इसे बाँधना बहुत मुश्किल है। भाषा तो बहुत छोटी चीज है ज़िन्दगी की विशालता के सामने।

ऐसा भी हो सकता है कि कवि कुमार विश्वास को इजाज़त के प्लेन वाले दृष्य में माया द्वारा भेजी गयी भेंट महेन्द्र को मिलने के बाद के दृष्य देखकर ही अपनी प्रसिद्ध कविता - "एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है / एक पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है"  के लिये प्रेरणा मिली हो।

सम्बंधों पर बनायी गयी फिल्मों में इजाज़त गुलज़ार का बेहद उल्लेखनीय काम है। एक परिपूर्ण फिल्म की योजना यहाँ दिखायी देती है। खाली हाथ शाम आयी है की टाइमिंग देखिये। महेन्द्र के हार्ट अटैक वाले सीन में नसीर की अदाकारी देखिये। एक सम्पूर्णता है हरेक संवाद में -"सुधा तलाक लेने का नहीं देने का सोच रही है।"

सूक्ष्म स्तर पर परिपूर्ण हैं फिल्म के संवाद। सभ्य किरदारों की कहानी है इजाज़त। आँधी में छोड़े गये रिश्तों में अलगाव के रेशे यहाँ एक झीना परन्तु मुकम्मल वस्त्र बुन देते हैं। फिल्म के दृष्य इतने प्रभावी हैं कि जब जिस चरित्र की तरफ से फिल्म दिखायी जाती है तब दर्शक भी उसी चरित्र की तरफ से फील्डिंग करने करने लगता है।

सुधा के घर छोड़ने पर दिल के दौरे की बात जब महेन्द्र सुधा को पहली बार बताते हैं तो इस दृष्य को पहले ही देख लेने के बावजूद सुधा के साथ दर्शक भी चिहुँक जाते हैं। अगर महेन्द्र बता देते सुधा को कुद्रेमुख से लौटकर ही कि माया ने आत्महत्या करने की कोशिश की तो एक अलग ही कहानी बन जाती और जैसा कि एक बार महेन्द्र माया से कहते हैं कि - "वे उसे सुधा के हवाले कर देंगे क्योंकि सुधा समझदार है और वह वही करेगी जो सच है और सही है और उसे जरुर पता होगा कि क्या करना चाहिये।"

माया तो आजाद हवा थी, उसके साथ शायद महेन्द्र भी न रह पाते पर समय चक्र ऐसा घुमता है कि माया और सुधा दोनों महेन्द्र के जीवन से दूर चली हैं।

फिल्म दिल के साथ छेड़छाड़ करती है, उसे कचोटती भी है, दिमाग पर एक नशे की खुमारी भी चढ़ाती है और कभी उसे जाग्रतावस्था में भी ले आती है जब सम्बंधों के बारे में ऐसा दिखा और समझा जाती है जो अब तक दर्शक के जेहन से अंजान ही था। अगर किसी को ऐसा लगता हो कि वह ज़िन्दगी को समझने लगा है तो उसे इजाज़त दिखा देनी चाहिये, उसका गुरुर टूट जायेगा।

सुधा महेन्द्र के दुख और दर्द दोनों से वाकिफ हो जाती है रेलवे के वेटिंग रुम में। वह दुखी है, बहुत ज्यादा दुखी है महेन्द्र के दुख से और कहीं न कहीं अपनी नादानी को भी इसका जिम्मेदार मानती होगी और जब दर्शक और महेन्द्र दोनों को लगता है कि शायद अब फिल्म में महेन्द्र और सुधा के उलझन भरे जीवन में एक सुखद पड़ाव आ गया है और नयी शुरुआत हो सकती है उसी समय आँधी तूफान की तरह एक ऐसे आकर्षक, खुशमिजाज़ शख्स का प्रवेश वेटिंग रुम में होता है जिसका आगमन महेन्द्र के पैरों तले से जमीन खिसका देता है।

"पिछले साल मैंने शादी कर ली" - जब सुधा कहती हैं तब
नसीर तो अवाक खड़े रह ही जाते हैं, दर्शक भी समझ नहीं पाते कि किस किरदार की तरफ से वह जीवन को समझे ! इस बार जब सुधा जब बाकायदा इजाज़त माँगती हैं महेन्द्र से अपने वर्तमान पति के साथ जाने के लिये तब महेन्द्र द्वारा दिये गये आशीर्वाद में प्रेम की ऊँचाई का एक अन्य रुप फिल्म दिखा देती है।

जीवन क्या कठोर है? जीवन ने इतने बरसों में परिवर्तन ला दिया है। एक और शख्स से जुड़ाव हो गया है सुधा का। और यह जुड़ाव भी दिल से है। वह वही करती है जो आज का सच है और आज सही है। नारी ज्यादा सही निर्णय लेती है इन मामलों में।

अंत ऐसा है कि आँखें उभर आयी नमी से धुँधली हो जायें तो समझिये गुलज़ार की कला ने आपको ठीक जगह छू लिया है। बहुत कम फिल्मों का ऐसा अंत देखने को मिलता है। फ्रीज शॉट और पार्श्व में से आती हुयी ट्रेन की ध्वनि। सुबह 7.30 की ट्रेन जिस पर सवार होकर दो पुराने साथी अपनी अपनी अलग मंजिलों की तरफ तो जायेंगें पर एक दूसरे के ख्यालों से भरे हुये। एक विवशता भरी मुस्कान, आँसु बहाते दो नैन, एक संवेदनशील मुस्कान मानो कह रही हो, धन्यवाद तुम्हारी असंवेदनशीलता को जिसके कारण मुझे ऐसा नगीना मिला, कितना बड़ा दुर्भाग्य था तुम्हारा और है।

पर ज़िन्दगी कहानी नहीं है जो बस यहीं रेलवे स्टेशन पर खत्म हो जाये। ज़िन्दगी तो सुधा के आँसुओं में है, पीछे लौटकर दुखी खड़े महेन्द्र को देखती उसकी भावप्रवण आँखों में है, उसकी भावनाओं में है जो उसके साथ ताउम्र रहने वाली हैं। पर स्टेशन पर लगी घड़ी तो दिखा रही है कि अभी तो ट्रेन छूटने में आधा धंटे से ज्यादा का वक्त्त है। कैसे कटेगा सुधा और महेन्द्र का यह वक्त, जब तक कि ट्रेन चल ही न दे!

उस वक्त या बाद में यात्रा के समय सुधा तो शायद आसुओं के लगातार बहने से धुँधला गयी आँखों और रोने से रुँधी आवाज से महेन्द्र की दुखभरी कथा को अपने पति को संप्रेषित कर रही होंगी और उनसे बेहद प्रेम करने वाले पति उन्हे सांत्वना दे रहे होंगे पर महेन्द्र कैसे उस दुख से पार पा पायेंगे जो इस बार इजाज़त लेकर गयी सुधा को खोने से उन्हे मिला है ? खोकर फिर से पाने का सौभाग्य और पाकर फिर से अपनी आँखों से खोते देखने का दुर्भाग्य जीवन को हिला तो देगा ही।

इजाज़त खत्म होकर भी खत्म नहीं होती, यह दर्शक के अंदर घुस कर बस जाती है। खुशी और गम के कितने ही दृष्य आकर उसकी स्मृतियों के साथ छेड़छाड़ करने लगते हैं।

इजाज़त के शुरु के कुछ मिनट और कतरा-कतरा गाने का फिल्मांकन , दोनों बेहद जिम्मेदारी से भारतीय पर्यटन को बढ़ावा देने का काम कर सकते हैं। हरियाली, पेड़, फूल पत्ते, पहाड़, चटटाने, नदी, आकाश, बादल, सूरज, उजाला, छाया, विम्ब, प्रतिविम्ब, ओस, आदि इत्यादी प्रकृति की खूबसूरती से भरे नजारे इन भागों में भरे पड़े हैं जिन्हे अशोक मेहता के कैमरे ने प्रकाश, छाया और रंगों के मिश्रण के द्वारा गुलज़ार के निर्देशन की छत्रछाया में इंद्रधनुषी खूबसूरती के साथ दर्शाया है। इजाज़त का साऊण्ड ट्रैक भी अनूठा है हिन्दी सिनेमा में। 


जिस किसी ने भी इजाज़त को एक बार भी देखा है उसके लिये इजाज़त कभी भी खत्म नहीं होती, खत्म हो भी नहीं पायेगी।

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The End 
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समीक्षक : राकेश जी

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