शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

सांझी-रंगोली-अल्पना : सांस्कृतिक विरासत

[ समाज और संस्कृति ]


Rangoliimages
मनुष्य जन्मतः कलाकार है ! मानव विकास के साथ कलाओं का विकास जुड़ा हुआ है ! कलाएं मानव जाति के इतिहास, पुराण, सभ्यता, संस्कृति, उत्थान-पतन का भी दस्तावेज है ! उसकी निजी जीवन के सुख-दुःख, जय-पराजय, की भी साक्षी है ! वात्स्यायन ने चित्रकला को श्रेष्ठ कलाओं में माना है ! अक्षरो के आविष्कार का श्रेय भी चित्रकला को जाता है ! आदि मानव चित्रों के माध्यम से ही चिंतन भी किया करते थे ! मनुष्य में भूमि के प्रति अनन्य निष्ठां रही है ! समस्त प्राचीन संस्कृतियों में किसी ना किसी रूप में मातृदेवी अथवा भूदेवी की पूजा का विधान रहा है !

भूमिचित्रों में पर्याप्त विविधता है ! विशेष भूभागों की स्थानीय रुचियाँ, लोक कथाएँ, किवदंतियां, पौराणिक कहानियां, स्थानीय देवी-देवता, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, रीति-रिवाज, पर्व-त्यौहार उस क्षेत्र के अलंकरणों का प्रेरणा श्रोत बने ! स्थान परिवर्तन से रंग और रेखाएं भी अलग हुयीं ... नाम भी अलग हो गए पर मूल भावना एक ही रही -- अपनी संस्कृति, अपनी प्रकृति, लौकिक माध्यम से अलौकिक का आह्वान !
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नामों में अनेकानेक भिन्नताएं है ! बंगाल में इसे "अल्पना" कहते हैं, उडीसा में "ओसा", अल्मोडा-गढ़वाल में "अपना" है तो बिहार-झारखंड में "अरिपन", उत्तर-प्रदेश में "सोन रखना" या "चौक पूरना" कहा जाता है तो राजस्थान में "मांडणा", गुजरात में इस समृद्ध परंपरा को "साथिया" नाम से जाना जाता है, ब्रज और बुंदेलखंड में "सांझी", पहाड़ी क्षेत्रो में यह "आंनी" है! तो सुदूर तमिलनाडु में "कोलम", केरल में "ओनम", आँध्रप्रदेश में "मुग्गू" ! महाराष्ट्र की "रांगोली" तो विख्यात है ही ! अपने-अपने क्षेत्र में हर मांगलिक अवसर पर इनके माध्यम से मनुष्य की प्रार्थना, भावना, आत्मीयता, और प्रसन्नता अभिव्यक्ति पाती है, संस्कृति की पहचान बनती है, पूरे देश की आत्मा का संगीत मुखरित होता है !
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महाराष्ट्र की 'रंगोली' के लिए पहले उजले चमकदार पत्थरों को गर्म कर चूर्ण बनाया जाता था, फिर पत्तों को उबालकर उसके कई तरह के रंग बनाये जाते थे ! अब रासायनिक रंगों का प्रयोग होने लगा है ! गुजरात के 'साथिया' में चाकलेटी, मोरपंखी या बैगनी रंगों की प्रमुखता होती थी ! राजस्थानी 'मांडणों' में लाल, भूरा, हरा रंग चमकता है ! दीपावली के 'मांडणे' में सफेद रंग होता है ! ब्रज या बुंदेलखंड में की 'सांझी' स्थानीय लोक-कथा को लेकर बनायीं जाती है ! गोबर से लिपी-पुती जमीन पर एक लड़की की आकृति बनाकर विभिन्न सूखे रंगों, रंग-बिरंगे फूलों से 'सांझी' का रेखांकन व श्रृंगार होता है ! बंगाल की 'अल्पना' में सफेद, पीले और लाल रंगों की अधिकता होती है ! ये चित्र स्वास्थ्य, समृद्धि और मंगल कामना को लेकर बनाए जाते हैं ! प्रत्येक शुभ अवसर पर चाहे वह धार्मिक उत्सवों पूजनों का हो या सामाजिक समारोहों का हो, या विवाह का या सोलह संस्कारों में से किसी एक का हो !
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गृहणियां, कन्याएं, इन चित्रों के द्वारा अपनी मंगल कामना प्रकट करती हैं ! पुरुषों के द्वारा भूअलंकरण केवल तांत्रिक विधानों में अथवा विशेष पूजा में किया जाता है ! भूअलंकरण अत्यंत पवित्र उदभावना है !

इन चित्रों की पूजा नहीं होती, पर इनमें पूजा भाव निहित है ! व्यक्ति के साथ परिवार, परिवार के साथ समाज, विभिन्न समाजों के साथ एक राष्ट्र के उत्कर्ष, विस्तार और मंगल की कामना से परिपूर्ण, मातृशक्ति द्वारा संचालित यह कला हमारे राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है !

25 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर जानकारी
    बहुत अच्छा लगा पढ़कर .... आपका धन्यवाद

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  2. nice and intreting information

    J.K

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  3. "रंगोली के माध्यम से मनुष्य की प्रार्थना, भावना, आत्मीयता, और प्रसन्नता अभिव्यक्ति पाती है, संस्कृति की पहचान बनती है, पूरे देश की आत्मा का संगीत मुखरित होता है !"
    आपने बेहद सुन्दर और ज्ञानवर्धक जानकारी दी
    आभार और शुभकामना

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  4. बहुत अच्छी जानकारी दी है जी, धन्यवाद
    रंगोली के बारे में जानने की इच्छा भी थी

    प्रणाम स्वीकार करें

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  5. आज आपसे काफी जानकारी मिली - आपका धन्यवाद
    सांझी और अल्पना जैसे शब्दों का मतलब भी जाना
    मेरी शुभकामनाएं

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  6. सुन्दर चित्रों से सजी यह बहुत ही सुन्दर पोस्ट है और इस में दी गयी जानकारी भी अद्भुत है.
    अपने नाम के अर्थ का यह विस्तार तो मुझे भी नहीं मालूम था.अल्पना का दूसरा अर्थ रंगोली ही मालूम था..और भू अलंकरण का महत्व भी आप ने विस्तार से समझाया.
    इसके लिए आभार.यह पोस्ट मेरे लिए संग्रहणीय है क्योंकि मेरे नाम से सम्बंधित जो है.

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  7. एक सुझाव -पसंद का स्टिक्कर drag कर के पोस्ट के नीचे या कहीं साइड में ex-हिसाब किताब के नीचे --जहाँ से आसानी से दिख सके ,लगा देंगे तो पाठकों के लिए बेहतर होगा.अभी मुझे भी ढूंढ़ना पड़ा है.

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  8. बहुत सुन्दर व रोचक पोस्ट....काफी जानकारियां मिली...पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...आपका धन्यवाद

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  9. वाह तरह तरह की रंगोलिया, ओर बहुत सुंदर जानकारी के लिये धन्यवाद

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  10. kitni sundar-sundar design hain
    hamen bahut attractive lagi
    alpana didi you are lucky because, you have so many names.

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  11. अलका मुझे तो खुद भी नहीं मालूम था..हाँ केरल में ओणम के अवसर पर जो बनाया जाता है उसे पूकलम कहते हैं--poo-ka arth hai phool और kalam-design
    --यह मुझे इस लिए मालूम है क्योंकि यहाँ गल्फ में हर ओणम पर इसे बनाया जाता है-स्कूलों में भी प्रतियोगिता रखी जाती है --yahan ham rice powder use karet hain phoolon ki jagah--

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  12. बहुत सुन्दर लगी अल्पना नाम की जानकारी और इस से जुड़े हुए चित्र शुक्रिया

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  13. बेहद ज्ञानवर्धक जानकारी और बहुत आकर्षक रंगोलियों के चित्र.
    सच में हम अपनी संस्कृति के प्रति किस कदर अनजान हैं. किसी भी रीति-रिवाज के पीछे उसका लम्बा इतिहास छुपा होता है. आपने बिलकुल सही कहा कि - 'यह कला हमारे राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है !'
    उत्कृष्ट लेखन के लिए बधाई और आपका आभार

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  14. बहुत सुन्दर, आकर्षक और उपयोगी पोस्ट
    पढ़कर अच्छा लगा

    [यह क्यूँ लिखा कि पुरुषों के द्वारा भूअलंकरण केवल तांत्रिक विधानों में किया जाता है ?
    मैंने बहुत से पुरुषों को रंगोली बनाते देखा है ... मैंने भी २-३ बार रंगोली बनायी है ]

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  15. @ शिवेंद्र डियर
    मैंने आम जनमानस की बात कही है ! कहीं किसी तरह का निषेध नहीं है ! आजकल तो बहुत से पुरुष "प्रोफेशनली' इस काम को कर रहे हैं ! एक रंगोली बनाने के 300 से 500 रुपये तक लेते हैं !

    मैंने खुद बहुत बार घर पर रंगोली बनायी हैं :)

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  16. बहुत सुन्दर जानकारी है और रंगोली के चित्र भी आकर्शक हैं अपनी परंपरा पर एक सुन्दर पोस्ट बधाई

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  17. Alpana Didi aapne bhi kabhi Rangoli banayi hai ?
    hamne last year school men Rangoli Competition men Participate kiya tha wo bhi senior group me.
    hame Second Prize Mila tha. hamne Ganesh ji ko banaya tha and flowers se decorate kiya tha

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  18. वाह तरह तरह की रंगोलिया.
    बहुत सुन्दर व रोचक पोस्ट....काफी जानकारियां मिली...पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...
    आपका धन्यवाद

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  19. सुन्दर और आकर्षक पोस्ट /
    बहुत अच्छी जानकारी दी आपने /
    मैंने जमीन पर तो नहीं पोस्टर पर खूब बनायीं है रंगोली

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  20. समस्त Creative Manch परिवार को विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाऎँ

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  21. भारतीय संस्कृति की विराटता को समेटे सुन्दर पोस्ट

    विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाऎँ

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  22. माननीय प्रकाश जी ,
    जय हिंद
    मैं अनुगृहित हुई कि आप मेरे घर पधारे ,मेरी घास -फूस की कुटिया आपके आगमन से धन्य हुई ,मैं एहसानमंद हूँ कि आपने मेरे ब्लॉग को अनुसरण योग्य समझा
    आपका नाम अभी गत दिनों ज़ाकिर भाई से हो रही चर्चा के दौरान पता चला था ,मैं आपसे परिचित भी होना चाहती थी ,खैर पहला परिचय ही रंगीन और सुखद रंगोलियों के माध्यम से हुआ ,अच्छा संयोग है ,हमारे घर में तो हर तीज-त्यौहार ,जन्मदिवस समारोह और राष्ट्रीय पर्व बिना रंगोली के होते ही नहीं अर्थात वर्ष में कम से कम ३० बार रंगोली तो बननी ही है ,हमारे संस्कार ,रीति रिवाज़ बहुत अद्भुत एवं वैज्ञानिकता से भरपूर हैं ,काश नयी पीढी इसे जान जाती

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